सोच बदलनी होगी
जब बेटी घर से बाहर निकलती है,
तो सबसे पहले यही कहा जाता है —
“ढंग के कपड़े पहन कर जाओ…”
लेकिन कभी बेटे से ये नहीं कहा जाता
कि अपनी नजरें साफ रखो।
बेटी को समझाया जाता है —
“घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है…”
पर बेटे को ये क्यों नहीं सिखाया जाता
कि किसी और की इज्जत से खेलना गलत है?
हर समय नजर रहती है बेटी के फोन पर,
कौन बात कर रहा है, क्या कर रही है…
लेकिन कभी ये जानने की कोशिश नहीं होती
कि बेटा इंटरनेट पर क्या देख रहा है।
जो भाई बहन को डांटता है
किसी लड़के से बात करने पर,
The same brother laughs and laughs at home about his relationships
.
जब बेटा किसी लड़की के साथ घूमे,
तो कहते हैं — “बड़ा हो गया है…”
और अगर बेटी किसी दोस्त से भी बात कर ले,
तो उसे गलत समझ लिया जाता है।
सच तो ये है —
गलती बाहर के समाज में नहीं,
शुरुआत हमारे अपने घर से होती है।
पहले घर की सोच बदलनी होगी,
तभी समाज बदलेगा।
हर बेटे को ये सिखाना होगा —
कि हर लड़की इज्जत के लायक है।
बात छोटी नहीं है…
अगर शुरू हुई है,
तो दूर तक जानी चाहिए।
बेटी को रोकने से पहले, बेटे को सिखाना ज़रूरी है।
यह कविता समाज में बेटे और बेटी के बीच होने वाले भेदभाव को उजागर करती है। एक सोच बदलने वाली हिंदी कविता जो हर किसी को पढ़नी चाहिए।
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